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जीवन का लक्ष्य सटीक,व्यावहारिक एवम चरित्र आदारित हो तो सफलता निष्चित है

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जीवन में सही लक्ष्य का निर्धारण करना सफल होने के लिए आवश्यक है अगर आपके पास शहर की सड़कों का नक़्शा हो, तो आपको अपनी मंज़िल तक पहुँचने में बहुत मदद मिलेगी। परंतु मान लीजिये आपको ग़लत नक़्शा दे दिया गया हो! मुद्रण की त्रुटि की वजह से दिल्ली के नक़्शे पर ग़लती से जयपुरछप गया हो! क्या आप उस कुंठा और असफलता की कल्पना कर सकते हैं, जिसका सामना आपको अपनी मंज़िल तक पहुँचने की कोशिश करते समय करना पड़ेगा?  हो सकता है आप अपने व्यवहार में सुधार करें, आप और ज़्यादा मेहनत करें तथा अपनी गति को दुगना कर लें। परंतु आपके प्रयास आपको तेज़ी से सिर्फ़ ग़लत जगह पर पहुँचने में ही सफल बनायेंगे। हो सकता है आप अपने नज़रिये में सुधार करें और अधिक सकारात्मक तरीक़े से सोचें। आप अब भी सही जगह पर नहीं पहुँच पायेंगे, परंतु शायद आपको इसकी परवाह नहीं होगी। आपका नज़रिया इतना सकारात्मक होगा कि आप जहाँ भी पहुँचेंगे, वहीं पर ख़ुश रहेंगे। मुद्दे की बात यह है कि आप अब भी भटक रहे होंगे। मूलभूत समस्या का आपके व्यवहार या नज़रिये से कोई लेना-देना नहीं है। इसका इस बात से पूरा लेना-देना है कि आपके पास जो नक़्शा है, वह ग़लत है। जब आपके पास जयपुर का सही नक़्शा हो, तब मेहनत महत्वपूर्ण होती है। जब आप सही रास्ते पर चलते समय हताश करने वाली कठिनाइयों का सामना करें, तब नज़रिये से सचमुच फ़र्क़ पड़ सकता है। परंतु पहली और सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता यह है कि नक़्शा सही हो,अर्थात लक्ष्य सही व निर्धारित हों।

आप जो बोते हैं, हमेशा वही काटते हैं; इसमें शॉर्टकट काम नहीं आते शोर्टकट तो स्थायी सफलता की नींव ही नहीं है। सिर्फ़ मूलभूत अच्छाई अर्थात चरित्र अदारित नीतिशास्त्र ही तकनीकों को सफल बनाती है। तकनीकों पर ध्यान केंद्रित करना स्कूल में रटकर परीक्षा देने की तरह है। आप कई बार पास हो जाते हैं, शायद आपके नंबर भी अच्छे आ जायें, परंतु अगर आप हर दिन क़ीमत नहीं चुकाते हैं, तो आप कभी उन विषयों में सचमुच निपुण नहीं हो सकते, जिनका आप अध्ययन करते हैं। तुरत-फुरत उपायों से आप शिक्षित मस्तिष्क का विकास नहीं कर सकते।

हममें से हर एक के मस्तिष्क में बहुत से नक़्शे होते हैं, जिन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में रखा जा सकता है:!. चीज़ें जैसी हैं के नक़्शे, और 2. चीज़ें जैसी होना चाहिये के नक़्शे। इन्हीं मानसिक नक़्शो के माध्यम से हम अपने हर अनुभव की व्याख्या करते हैं। हम नक़्शो (लक्ष्य)के सही होने के बारे में शायद ही कभी सवाल करते हैं। आम तौर पर तो हमें यह भी पता नहीं होता कि हमारे पास नक़्शे हैं। हम बस यह मान लेते हैं कि हम जिस तरह से चीज़ों को देखते हैं, वे सचमुच उसी रूप में हैं या उन्हें उसी तरह होना चाहिये। हमारे नज़रिये और व्यवहार इन्हीं मान्यताओं से उत्पन्न होते हैं। हम जिस तरह से चीज़ों को देखते हैं, उसी से यह तय होता है कि हम किस तरह सोचते और कार्य करते हैं।यही सच्चे मायनो में जीवन या चरित्र निर्माण कहलाता हैं1


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